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प्रधान सेवक होना बड़ी बात है।
कहे को निभाना उत्तम बात है।
निभा के सफल होना खरी बात है।
जनता है कुछ भी सोच लेती है।
जितने मुह उतनी बाते होती है।
हज़ारों आप से ख्वाईशें पाल लेती है।
सुनने बेठो तो दिशाएं नप जाती है।
पहले आप के सात काम बताते थे।
एक आप ने कर दिया बाकी भी हो जाएंगे।
ऐसा कुछ बड़े बडे सपने दिखाते थे।
चलो जो हुआ सो हुआ भूल जाते है।
इसबार तो सब ने आप से आस लगा ली है।
चार टुकड़ों की बात कह दी है।
एक हफ्ते में कश्मीर पूरा हमारा होगा।
मन मे जम के ये बात बिठा ली है।
कोई गीता का संदेश दे रहा है।
बस अपने पे लागू नही कर रहा है।
कोई ठिकाने बता रहा है उकसा रहा है।
कोई शब्दो मे द्रोह खोज रहा है।
शायद अपना पाप छुपा रहा है।
कोई खुली छूट दे रहा है ललकार रहा है।
कोई सरहदें लांघ रहा है खत्म कर रहा है।
कोई हुक्का पानी बन्द कर रहा है।
कोई दुनिया को चेता रहा है।
कोई इसे मच्छर कोई भिखारी बता रहा है।
कोई इसे कटोरा थमा रहा है।
कोई इसे नासूर बता रहा है।
कोई इसे फेल मुल्क समझा रहा है।
क्या बतायें सेवक जी सौ मुँह सौ बातें।
सुन रहे हो न जो कह रहा हूँ।
मुझे मालूम है आप परिपक्व हो।
सब देख रहे हो।
एक बार मे निशाना साधने की सोच रहे हो।
इतिहास बनाने की कवायत में जुटे हो।
इतिहास युद्धों से और जीतने से बनता है।
ऐसा कुछ लोग सोच रहे है।
जितने मुह उतनी बाते है जी।
समय अनमोल है बीत रहा है।
सारे ज्ञान की कुंजी प्रेम दे रहा है।
चाणक्य सारे द्वार खोल रहा है।
देखो प्रधानसेवक कुछ सोच रहा है।
कुछ सोच रहा है।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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