💐****✍🏼हम सब अपने जीवन में बहुत सी इच्छाओं से बंधे है। अपनी खुशियां तलाशते कही न कहीं उन्हें ढूंढते कई बार स्वार्थी हो जाते है। स्वार्थ वश कहीं न कहीं किसी की कोई न कोई भावना आहत हो जाती है। किसी न किसी की अगर न भी हो तो अपनी तो हो ही सकती है। स्वार्थ और मोह बहुत से मन की व्याधियों के कारक है। मोह किसी से भी ज्यादा हो तो याद कीजये उसके थोड़ा दूर जाते ही हमे कैसे विरह खिन्नता एकाकीपन के एहसास से झूझना पड़ता है। अपना एक अनुभव सुनाता हूँ।बहुत पुरानी बात है शायद सन 1986 की। मेरे मासी मासड़ किसी कार्य वश हमारे घर रहने आये। मुझे मासड जी अच्छे लगते थे। मासी भी बहुत प्यार करती थी। कई दिन हमारे घर रहे। इस दौरान उनके साथ साथ वक़्त गुजारने को काफी समय मिला। और जब आप एक साथ काफी दिन रहते हो और सुबह शाम आप को चेहरे से परिचय की आदत हो जाती है। तो आप की दिनचर्या में उनका अनुभव उतर आता है। मासड जी का गठा कसरत का शरीर था। मुझे भी बड़ा शौक था कसरत वर्जिश का। उनसे कुछ कुछ चीज़ें सीख ली। आज शायद उन्हें याद नही। पर में उनसे प्रभवित था। अपने माँ बाप भी सदैव आस पास या सदैव सामने ही रहते थे। अब मेरे मासी मासड कुछ समय के लिए हमारे पास आये। काम क्या था ये तो ढंग से याद नही। पर फिर वो दिन आया जब उनकी अपने घर जाने की लिए बापसी हुई। लगाव मन से बढ़ा हुआ था। उन्होंने जैसे ही अपना सामान उठाया तो मन में अजीब सा आभास हुआ। वो जा रहे थे में देख रहा था। मन अशान्त हो चला था। घर में घुसने को दिल नही कर रहा था। उनके जाते ही घर में मा बाप के होते हुए भी एक अजीब खिन्नता खालीपन का अनुभव हुआ। में घर से पार्क में आ गया। उनके बिना घर में अजीब सा लग रहा था। पार्क में कुछ समय बैठा तो अशान्त मन कुछ काबू आने लगा। पर अजीब सा एहसास खालीपन अभी जा नहीं रहा था। ये सब कई दिन चला । पर धीरे धीरे खिनता कम होने लगीं। मां बाप के साथ वक़्त बीतने लगा और समय ने खालीपन को भर दिया। जब वो जा रहे थे तो मन कर रहा था पकड़ के बिठा लूँ। जाने न दूं। पर ये सब मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था। मैं अपनी खुशी के लिए स्वार्थ वश उन्हें घेरना चाहता था। उनके भी बच्चे उनके आने की आस लगाए बेठे होंगे ये बड़ा होकर ही समझ आया। मित्रो स्वार्थ सिद्धि भावनाओ से शुरू हो मन को लालच की तरफ धकेल देती है। और ये ही मन के अधूरे विषयक को बमन के रूप में स्वार्थ सिद्धि और अहित में लगा देती है। कर्म भी गलत राह पकड़ लेते है। कदम कर्मो वश गलत राह पे अनजाने चलेे जाते है।अंत में कहीं न कहीं पश्चतताप गलानि और कुंठा का भाव पैदा हो आप की परेशानियां बढ़ा देता है। भाव ये है ज्ञान के माध्यम से स्वार्थ सिद्धि को त्याग कर्म के बेहतर करते हुए मन को निर्मल कर द्वेष को बाहर निकाल अपनी शुद्धि प्रकिर्य जारी रखिये। ये ही मन के निस्वार्थ भाव है। जब ज्ञान होगा तो आश्चर्य से ज्यादा सचाई से वाकवियत होगी और मन भी काबू में रहेगा।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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