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आज एक विषय पे सोच रहा था कि क्या हम किसी को जोर जबरदस्ती डर से अपने साथ ला सकते है? अगर ले आये तो क्या गारंटी है कि वो हमेशा के लिए हमारे साथ हो लेगा? और अगर ऐसा ही तो रास्ता क्या है? बड़ी विडंबना की स्तिथि उतपन्न हो गयी थी। दिमाग को एकाग्र कर इसका रास्ता ढूंढने लगा।एक बात तो समझ आयी इतिहास को जरा सा झांक के देखा की वक़्ती तौर पर डर की सत्ता के माध्यम से कुछ समय के लिए जन या जन समूह को साथ लाया जा सकता है।ये संभव है।हमारे यहां अंतिम राज्य अंग्रेज़ो का था वे भी इस प्रयोग में असफल रहे।उससे पहले मुग़ल काल था वे भी इसमें असफल रहे।दोनों साम्राज्यों का पत्तन हुआ। अशोक अंत में कलिंग की बभीषिक देख के अन्तर्मन से असफल रहा और बोध भिक्षुक हो राज्य करने लगा ।बहुत से आक्रांताओं ने डर का इस्तेमाल किया।और कुछ समय के लिए राज्य जमा पाये। और मौका मिलते ही आवाज़ें बुलुन्द हुईं और इनका पत्तन होता गया।इराक हाल ही में तबाह हुआ है।इजराइल फिलिस्तीन को दबा नही पा रहा।लीबिया में गदाफी का अंत बुरा हुआ।बहुत से इस विषय पे उधाहरण है।डर से कुछ वक्त ही साथ लिया जा सकता है।और जब जनता क्रांति पे उतर आए तो सब अंत। एक बात तो तह है जोर जबरदस्ती डर से कोई व्यक्ति विशेष या जन समूह सामयिक आप के साथ हो सकता है।और वक़्त मिलते ही खिलाफत बगावत हो ही जातीं है। ये हमने सालों के दबाब में रह रही भारतीय जनता के अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह स्वरूप भी देखा। डर से कोई हमेशा के लिए नही दबाया जा सकता।ये डर का दर्शन शास्त्र बेहद बुरे तरीके से फेल रहा है।हिटलर हार ही गया अंत में। फिर दूसरा रास्ता क्या है? मेरी समझ में प्रेम से बड़ा कोई मार्ग नही जोड़ने का या जुड़ने का।प्रेम की ताकत को कोई तोड़ नही सकता।ये बेहद मजबूत कड़ी होती हैं किसी भी रिश्ते की। प्रेम आपको मजबूती के साथ साथ त्याग का भाव भी देता है। सहनशीलता प्रदान करता है।आप की नज़दीकियां बढ़ाता है।जहां प्रेम का भाव है वहां आप वास करने में पराया पन महसूस नही करते।ये आप सब अपने घर में ही साफ होते देख सकते है।जहां प्रेम है वहां परिवार बड़ा भी होता है और यशस्वी भी होता है।और जहां मन मुटाब और द्वेष होता हैं वहां परिवार सुकड़ जाते है।रिश्ते हमेशा दबाब में रहतें है।आप एकाकी मूल परिवार बन जाते हो।दायरा सिमट जाता है।सोच सिमट जाती है।अंत पतन बौद्धिक समाजिक और जीवनमूल्यों का होता है। बहुत कुछ येही सामाजिक व्यवस्था में भी होता है।तो अगर अब दो समाजों ने आपस में बंधुत्व स्थापित करना है जो चिरकाल तक चले तो प्रेम से बेहतर कोई साधन नही।येही दूसरों को अपने परिवार में लाने का बेहतर बिना मारकाट डर का रास्ता है। गांधी जी के असहयोग आंदोलन से लेकर अंग्रेज़ो भारत छोड़ो इसका जीता जागता उदाहरण है।ये डर के शासन का अंत तो था ही।आपसी भाईचारे और प्रेम का इससे बेहतर सामाजिक उधाहरण दुनिया के पास आज तक नही है। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब एक परिवार बन के आजादी के युद्ध में कूद गये और अंत में सफलता हाथ लग ही गई।कुछ तत्व जब भी प्रेम के दुश्मन थे आज भी है।उस वक़्त एक महात्मा की जान गई।आज रोज जाने जा रही है। खाई पटेगी तो सिर्फ प्रेम से ।अध्यापक के डंडे के डर से बच्चे मेधावी आज तक नही हुए तो आप किसी की बुद्धि को कैसे पलट लोगे डर से।पर सत्य प्रेम से बुद्धि पलटी जा सकती है।इसे जिसने भी अपने जीवन में एक बार भी अपने दिल से गुजारा और महसूस किया हो वो इसकी ताक़त समझ सकता है।बाकी डर की कोई बिसात नही।इससे कोई अपना नही बन सकता।प्रेम की भाषा इंसान से लेकर जानवर तक बिना बोले ही समझ जाते है।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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