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हमारा पार्क एक सांझी जिम्मेवारी।

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आज विषय थोड़ा अलग है।हमारे घर के पास एक पार्क है।जिसका रख रखाब कुछ महल्ले के महानुभाव करते है।जिन्होंने मिल के जिम्मेवारी एक महानुभाव को दे रखी है।पार्क सरकारी ही होते है।जनाब अब से कुछ समय पहले पार्क में सेवा देते थे।माली भी लगा रखा था।एक कहानीं हर रोज की थी वो ये की रोज किसी न किसी बात को लेकर बच्चों औरतों और बजुर्ग महिलाओं से किसी न किसी बात पे पार्क को लेकर तू तू मैं मैं।कारण पहला बच्चे पार्क में फुटबॉल खेलते क्यों है?छोटे बच्चे खेलेंगे बड़े नही। और जान लीजिये आस पास खेलने के लिये कोइ पार्क भी नही है।फिर कोई गरीब पार्क के नल से पानी क्यों भरे? कोई औरत सुबह पार्क से फूल क्यों तोड़े? और भी बहुत सी छोटी छोटी बातों पे झगड़े के हालात।कुछ दिन पहले ऐसे ही एक झगड़े ने बड़ा रूप ले लिया।एक पार्क में वर्चस्व के कारण एक महानुभाव बच्चों से भिड़ गये।बच्चे की माँ ने जरा लोहा ले लिया।जैसे ही मां ने लोहा लिया और बच्चे ने दूसरे बच्चों को खेलने के लिए कहा तो महानुभाव ने थपड़ बच्चे के जड़ दिया।आजकल की पीढ़ी थोड़ी अलग है।और कानून आप किसी के क्या अपने बच्चे पे भी  हाथ उठाने के अब हकदार नही है।बच्चे के अपने  कानूनी अधिकार है।खैर ये बात अलग है।इतने में जवान होते बच्चे का खून खोल गया और एक थपड़ बच्चे ने महानुभाव को जड़ दिया और अपने आप से बाहर होने लगा।ये हमारी कुछ कम होती व्यवहारिक शिक्षा के कारण भी था और समाज और बदलते समीकरण। बहुत बुरा था पहले बच्चे पे आवेश में आकर थपड़ मारने से  और बाद में बच्चे का हाथ उठाना।दोनों ही भर्त्सना के लायक बाते थी।बुरा हुआ।मामला पार्क में नही निपटा और जनाब अपने घर चले गये।और घर के बाहर डंडा लेकर बैठ गए।इतने में बच्चे के माता पिता मिल के बात करने महानुभाव के घर पहुंचे।बात बात मैं महानुभाव ने डंडे से हमला करने की कोशिश की।इस कोशिश को महिला ने नाकाम कर डंडा पकड़ा और महानुभाव को पीछे धक्का दिया।जनाब गिर गये।बच्चे के माता पिता वहां से चले गए।लेकिन उन्हें ये नही पता लगा कि एक तो महानुभाव उम्र दराज थे और गिर गए थे।गर्म माहौल मैं गर्मी होती ही है और परवाह भी नही होती।वे चले गए महानुभाव के हड्डी टूट गयी।हस्पताल पहुँच गये।इससे पार्क में रोज आने वाले 10 12 महानुभाव ने पार्क के वर्चस्व से  अपने आप को थोड़ा दूर कर लिया।सहानभूति की लहर चल पड़ी। फिलहाल महानुभाव ने अपने ऊपर हमले की शिकायत पुलिस में कर दी है।अब उनके एक साथी पार्क को जंगल कहने लगे है।माली भगा दिया है।पार्क में पानी की मोटर ताले मैं रहती है और ताले की चाबी उन महानुभाव के पास।पार्क में घांस सूखने लगी है।जो अपने को पौधों का प्रेमी बोलते थे ।आज उनको मारने पे उतारू हो गये है।और अपना राज खत्म होता देख पार्क बर्बाद हो और उसे खत्म करना चाह रहे है।लोगो को सबक देना चाहते है। पर अपने को सबक देना या सीखना नही चाहते।मैं मोटर के जंगले की चाबी मांगने के लिए बजुर्गों के पास गया।सब को चाबी का पता नही ये बोला।फिर आज सुबह उन महानुभाव से मुलाकात हुई जो रोज पानी देते अपने को पार्क का सबसे बड़ा खैरख्वा मानते और सब से झगड़ा करते।तो मैंने चाबी के विषय में पूछा।बोले हैं मेरे पास है।मैंने मांगी।तो बोलते सोचता हूँ।मैंने कहा सोचिये मगर पानी पार्क को चाहिए ।आप चाबी हमे दे दिजीये। आप को रोज बापिस कर दी जायेगी।थोड़ी देर की समझाइश के बाद एक डुप्लीकेट चाबी देने के लिए राजी हुए।मालूम है अभी भी मुशक्कत करनी ही पड़ेगी।इंसान हर जगह वर्चस्व क्यों चाहता है? क्यों ऐसे अधिकार को दूसरों से भागीदारी मैं डरता है? क्यों ये ख्याल उनके मन में आता है के उनसे बेहतर कोई नही कर पायेगा? फिर क्या सामान्य पार्क बच्चों के लिए समान रूप से नही बना है? घर बाहर एक जैसे ही क्यों चलाना चाहते है? बहुत से प्रश्न गूंजे।फिर यही लगा पार्क पे सबके अधिकार बराबर  है।क्यों न इसे सुंदर बनाया जाए जहां बच्चे खेलें।फूल भी लगे और माताएँ बहने अपने इष्ट की पूजा के लिये बगिया का इस्तेमाल कर सकें ।बेरोकटोक पार्क का आनंद लें।और दिल से पार्क के सेवा भी करें और बच्चे खेलते खेलते इसमे आगे आ अपने को प्रकृति से जोड़े।ये प्रयास अब करने जा रहा हूं।देखता हूँ कहाँ तक सफल होता हूँ।घायल महानुभाव से सहानुभूति तो है पर सहमति नही।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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