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मंत्रमुग्ध हूँ जीवन मैं बसे रस रंगों से।
हर तरफ बहार ही नज़र आती है।।
मन इसके रसों का सदैव पान करता है।
शरीर इसके इंद्रधनुष से सजा रहता है।।
बहुत से रिश्तों के रस का स्वाद रोज लेता हूँ।
रिश्तों के रंगों से सदा सरोबार सदा रहता हूँ।।
पत्नी से जीवन रस सब रसों से रसीला।
पत्नी का हृदय साथ सब रंगों से रंगीला।।
बच्चों से जीवन रस चासनी से भी गाढ़ा मीठा।
बच्चों के होने से जीवन रंग भी गाढ़े चटकीले।।
माता पिता ने किया हममें जीवन रस संचार।
माता पिता ने बनाया प्रेम रंग संग जीवन संसार।।
दोस्तों ने घोली इस मे खुशबू रस अदद बहार।
दोस्तों ने दी दुनिया मे होली सी रंग बहार ।।
क्या रिश्ते क्या नाते सब रसों के भरे प्याले।
मुझमें भर देते न जाने कितने रंग हरदम निराले।।
हां में जी रहा हूँ इन्हें कहीं रूह की गहराइयों से।
मुझमें जितने जीवन रस रंग है बने महके इन्ही गहराइयों में।।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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