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मंत्रमुग्ध हूँ जीवन मैं बसे रस रंगों से।
हर तरफ बहार ही नज़र आती है।।
मन इसके रसों का सदैव पान करता है।
शरीर इसके इंद्रधनुष से सजा रहता है।।
बहुत से रिश्तों के रस का स्वाद रोज लेता हूँ।
रिश्तों के रंगों से सदा सरोबार सदा रहता हूँ।।
पत्नी से जीवन रस सब रसों से रसीला।
पत्नी का हृदय साथ सब रंगों से रंगीला।।
बच्चों से जीवन रस चासनी से भी गाढ़ा मीठा।
बच्चों के होने से जीवन रंग भी गाढ़े चटकीले।।
माता पिता ने किया हममें जीवन रस संचार।
माता पिता ने बनाया प्रेम रंग संग जीवन संसार।।
दोस्तों ने घोली इस मे खुशबू रस अदद बहार।
दोस्तों ने दी दुनिया मे होली सी रंग बहार ।।
क्या रिश्ते क्या नाते सब रसों के भरे प्याले।
मुझमें भर देते न जाने कितने रंग हरदम निराले।।
हां में जी रहा हूँ इन्हें कहीं रूह की गहराइयों से।
मुझमें जितने जीवन रस रंग है बने महके इन्ही गहराइयों में।।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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