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पवित्र अपवित्र के भेद को कैसे कोई जाने।
कोई तन का पवित्र कोई मन का पवित्र।।
कोई तन से अपवित्र कोई मन से अपवित्र।
कोई विचार से पवित्र कोई सोच से अपवित्र।।
कोई कपड़ो से पवित्र कोई ओढ़नी से अपवित्र।
कोई बातों का पवित्र कोई खुराफातों से अपवित्र।।
कोई ज्ञान से पवित्र कोई अज्ञान से अपवित्र।
कोई मार्ग से पवित्र कोई कुमार्ग से अपवित्र।।
कोई प्रेम से पवित्र कोई घृणा से अपवित्र।
कोई मंज़िल से पवित्र कोई भटकाव से अपवित्र।।
कोई करुणा से पवित्र कोई क्रोध से अपवित्र।
कोई काम से पवित्र कोई आलस से अपवित्र।
कोई सादगी से पवित्र कोई ढोंग से अपवित्र।।
कोई सच्चाई से पवित्र कोई झूठ से अपवित्र।
कोई लाज से पवित्र कोई बेशर्मी से अपवित्र।।
कोई भाषा से पवित्र कोई कुभाषा से अपवित्र।
कोई ब्रह्मचार्य से पवित्र कोई कामुकता से अपवित्र।
कोई दान से पवित्र कोई भीख से अपवित्र।।
कोई व्रत संयम से पवित्र कोई असयंता से अपवित्र।
कोई शांति से पवित्र कोई उग्रता से अपवित्र।।
कोई सुविचार से पवित्र कोई कुविचार से अपवित्र।
कोई रिश्तों में पवित्र कोई रिश्तों से अपवित्र।।
कोई आचरण से पवित्र कोई दुराचरण से अपवित्र।
और जो तन मन से पवित्र वो हर तरह से पवित्र।।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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