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मैं बहुत से कर्जो में डूबा हूँ।
जिधर देखता हूँ कहीं न कहीं किसी का ऋणी हूँ। इस खूबसूरत संसार मे आने के लिए मातृऋण से ऋणी हूँ।इस संसार के सुखों का बोध कराने के लिये पितृऋण से ऋणी हूँ।समस्त शिक्षा ज्ञान के लिए गुरु का ऋणी हूँ।युवा अवस्था मे जीवन रंग भरने के लिये अर्धांगिनी स्वामिनी धर्मपत्नी प्रेमिका से विवाह देहसुख से ऋणी हूँ।जीवन अंकुर डालने के लिये संतान से ऋणी हूँ।सामाजिक व्यवस्था में स्थान देने के लिये समाज का ऋणी हूँ।ईश्वरीय मार्ग पे भक्ति देने के लिए ईश्वर और उसकी ईश्वरीय सत्ता का ऋणी हूँ।संतान सुख के लिये कर्मो का ऋणी हूँ।भूख खत्म करने के लिये अनाज का ऋणी हूँ।शुद्ध हवा वायु के लिए प्रकृति का ऋणी हूँ।शुद्ध साफ जल सेवन से नदियो का ऋणी हूँ। ये ऋण न जाने अनजाने कितनो का मुझ पे है और कितने है।में हर वक़्त हर लम्हा किसी न किसी ऋण से ऋणी हूँ।मेरी इतनी औकात कहाँ जो इसे लौटा सकूं।बस इतनी मुझमें हे ईश्वर शक्ति भक्ति पवित्रत दे के बस मैं केवल इन्हें सहेज के बस ब्याज ही लौटाने में सक्षम हो सकूं।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏❣❣❣❣❣🇮🇳❣❣❣❣❣✍🌹 भारतीय संविधान भाग 9 अनुच्छेद 243 घ। 243 घ. स्थानों का आरक्षण–(1) प्रत्येक पंचायत में– (क) अनुसूचित जातियों ;और (ख) अनुसूचित जनजातियों, के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात , उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या से यथाशकक़्य वही होगा जो उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की अथवा उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अनुपात उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है और ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आबंटित किए जा सकेंगे। (2) खंड (1) के अधीन आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान, यथास्थिति , अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे । (3) प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए ...
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