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मैं बहुत से कर्जो में डूबा हूँ।
जिधर देखता हूँ कहीं न कहीं किसी का ऋणी हूँ। इस खूबसूरत संसार मे आने के लिए मातृऋण से ऋणी हूँ।इस संसार के सुखों का बोध कराने के लिये पितृऋण से ऋणी हूँ।समस्त शिक्षा ज्ञान के लिए गुरु का ऋणी हूँ।युवा अवस्था मे जीवन रंग भरने के लिये अर्धांगिनी स्वामिनी धर्मपत्नी प्रेमिका से विवाह देहसुख से ऋणी हूँ।जीवन अंकुर डालने के लिये संतान से ऋणी हूँ।सामाजिक व्यवस्था में स्थान देने के लिये समाज का ऋणी हूँ।ईश्वरीय मार्ग पे भक्ति देने के लिए ईश्वर और उसकी ईश्वरीय सत्ता का ऋणी हूँ।संतान सुख के लिये कर्मो का ऋणी हूँ।भूख खत्म करने के लिये अनाज का ऋणी हूँ।शुद्ध हवा वायु के लिए प्रकृति का ऋणी हूँ।शुद्ध साफ जल सेवन से नदियो का ऋणी हूँ। ये ऋण न जाने अनजाने कितनो का मुझ पे है और कितने है।में हर वक़्त हर लम्हा किसी न किसी ऋण से ऋणी हूँ।मेरी इतनी औकात कहाँ जो इसे लौटा सकूं।बस इतनी मुझमें हे ईश्वर शक्ति भक्ति पवित्रत दे के बस मैं केवल इन्हें सहेज के बस ब्याज ही लौटाने में सक्षम हो सकूं।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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💐क्या कहें किससे कहें।सब तरफ अपने आप से सब मशगूल हैं ।सब इस तरह की हम कमोबेश काम से ही नज़र आतें है। दौड़ती है जिंदगी कुछ इस रफ्तार से के हम पीछे से छूटे जाते है। कहें दिल की किसस...
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