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तारीफ के पुल कितने बांधे बांधते गये।
हम बांधते गये वो ढहाते रहे ढहाते गये।।
हम दूर बेठे लुत्फ लेते रहे वो गुस्सा रहे।
उनको सब नकारना था नज़ारा लेना था।।
दिल मे बहुत कुछ था जो मन से कहना था।
उन्हें सुनना न था और हमे सुनाना ही था।।
जिससे इश्क़ हो जाये वो हाले दिल ही है।
जिसे वो सुनाया जाये वो मोहब्बतें नूर है।।
तारीफ तो हम इश्क़ की करते है।
वो अपनी समझते है ये उनकी नादानी है।।
लुत्फ तो हम अपने इश्क़ का लेते है।
वो इशारा समझते है ये उनकी परेशानी है।।
आरजुयें कब तक रहेंगे दिलो में।
ये हर वक़्त तुम्हारी पनाहें ढूंढती है।।
तुम कितना भी दूर कर लो पनाहों से।
ये आरजुये फना होगी तेरी पनाहों में।।
हम नादान ही रहेंगे तुम्हे समझने में।
तुम जितना भी समझदार बन समझाओ हमे।।
ये खालिस इश्क़ का जोर है मोहतरमा।
इससे दिलों को ढाया है ये समझ लीजिये।।
न जोर तुममें कम है हमे दूर करने का।
न जोर हममें कम है तुम्हारे पास आने का।।
इनके ख्याल मगरूर हुस्न की रवायत है।
हमारे ख्याल पामाल नही के नाशाद हो बेठे।।
ये मेरा पशेमान होकर फ़ज़ से गुजरना तेरे दिल की आवाज़ है।
और अगर ये तुझे सकून देता है तो ये मेरे फ़वाद की दुआ समझ लेना।।
हम तेरी तारीफ में कसीदे पड़ते ही रहेंगे।
भले ये तुझे मेरा तस्सवुर किश्नगी ही लगे।।
तुम दानिस्ता दूर जाने को बेकरार हो तो।
अ हमनफज हम भी फना होंगे जान लो।।
तुम तरीफ़ लो न लो ये तुम्हारी तबियत है।
हम पुल बांधते जाये ये हमारी तबियत है।।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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