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ताला।

🌹🙏🏼❣❣❣❣🇮🇳❣❣❣❣✍🏼🌹
बहुत ख्याल आये आज ताले के।
सोचा कहाँ कहाँ  जडुं इन्हें।
सोचा क्यों न जुबांन पे जडुं पहले।
क्यों न नकारात्मक सोच पे जडुं इसे।
क्यों न अपनी जिद्द पे जडुं इसे।
क्यों न अपने क्रोध पे जडुं इसे।
क्यों न खोते विवेक पे जडुं इसे।
क्यों न अपनी तुच्छ आकांक्षाओं पे जडुं इसे।
क्यों न बढ़ती मनोविकृति पे जडुं इसे।
क्यों न खोती सहनशीलता पे जडुं इसे।
क्यों न द्वेष पालती बुद्धि पे जडुं इसे।
क्यों न विलासता के द्वार पे जडुं इसे
क्यों न भोग प्यास पे जडुं इसे।
क्यों न कटु वाणी पे जडुं इसे।
क्यों न असत्य वचनों पे जडुं इसे।
क्यों न काम अभिलाषा पे जडुं इसे।
क्यों न भीतरी उन्माद पे जडुं इसे।
क्यों न विभस्त सोच पे जडुं इसे।
क्यों न तृस्कार की भावना पे जडुं इसे।
क्यों न मूर्खता अज्ञान पे जडुं इसे।
क्यों न संदेह भाव पे जडुं इसे।
क्यों न धोखों पे लगाऊं इसे।
क्यों न फरेबों पे कसु इसे।
बहुत से प्रश्न उठे मन मे सोचा कहाँ कहाँ लगाऊं इन्हें।
कुछ गिन लिए कुछ लगा दिए कुछ बाकी रह गये।
इतना ही समझ आया बस इन तालों से खुशियां महफूज़ है।
और एक बात इन ताले को चाबी लगाकर फेंक दी मैनें ।
जय हिंद।
💫****🙏🏼****✍🏼
शुभ रात्रि।
🌹🌹🌹🌹🌹❣🌹🌹🌹🌹🌹

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