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बहुत ख्याल आये आज ताले के।
सोचा कहाँ कहाँ जडुं इन्हें।
सोचा क्यों न जुबांन पे जडुं पहले।
क्यों न नकारात्मक सोच पे जडुं इसे।
क्यों न अपनी जिद्द पे जडुं इसे।
क्यों न अपने क्रोध पे जडुं इसे।
क्यों न खोते विवेक पे जडुं इसे।
क्यों न अपनी तुच्छ आकांक्षाओं पे जडुं इसे।
क्यों न बढ़ती मनोविकृति पे जडुं इसे।
क्यों न खोती सहनशीलता पे जडुं इसे।
क्यों न द्वेष पालती बुद्धि पे जडुं इसे।
क्यों न विलासता के द्वार पे जडुं इसे
क्यों न भोग प्यास पे जडुं इसे।
क्यों न कटु वाणी पे जडुं इसे।
क्यों न असत्य वचनों पे जडुं इसे।
क्यों न काम अभिलाषा पे जडुं इसे।
क्यों न भीतरी उन्माद पे जडुं इसे।
क्यों न विभस्त सोच पे जडुं इसे।
क्यों न तृस्कार की भावना पे जडुं इसे।
क्यों न मूर्खता अज्ञान पे जडुं इसे।
क्यों न संदेह भाव पे जडुं इसे।
क्यों न धोखों पे लगाऊं इसे।
क्यों न फरेबों पे कसु इसे।
बहुत से प्रश्न उठे मन मे सोचा कहाँ कहाँ लगाऊं इन्हें।
कुछ गिन लिए कुछ लगा दिए कुछ बाकी रह गये।
इतना ही समझ आया बस इन तालों से खुशियां महफूज़ है।
और एक बात इन ताले को चाबी लगाकर फेंक दी मैनें ।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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