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ईश्वर की पूजा भक्ति हमारे अंदर एक आस्था को जन्म दे उसे प्रबल करती है।ये आस्था मनोकामनाओं को जगाने में सक्षम है।मनोवृत्तियां हमे बहुत सी अभिलाषाओं की और ले जाने में सक्षम है।और ये अभिलाषाएं ईश्वर से प्रसाद रूप ग्रहण को अधिकार का रूप भी देती है।हम भक्ति के रास्ते माया में फसें रह जाते है।येही सोचते सोचते मैं ईश्वर से मांगने लगा कुछ दींन रूप मे।
हे ईश्वर मैं तेरा उदंड बालक हूँ।
नही आता मुझे कोई सीधा रास्ता न समझ दुनिया की।
जहां देखो बंधनो का द्वार मुझे रोकता है और मैं फांदता भाग जाता ।
हे ईश्वर दे मुझे अपनी भक्ति का कुछ अंश।
हे ईश्वर दे मुझे अपनी आसक्ति में कुछ छंद।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब लालसाओं से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब क्रोधो से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब झूठों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुंक्ति सब आलस्यों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब वैमन्सयों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब अभिलाषाओं से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब अंधेरों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब अधिकारों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब कुविचारों से।
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब दलिद्रों से
हे ईश्वर दे मुझे मुक्ति सब संग्रक्षणो से।
है ईश्वर एक जगह दे दे बस अपने पहलू में।
जहां न मैं किसी का दिल दुखा सकू
न लोभ कर सकूं।
पर तेरे स्मरण से सब दुर्विचारों का मर्दन कर्क सकूं।
अपने भीतर छुपे ईश्वर अंश को खोज सकूं।
तेरे ज्ञान की राह पे चल एक तो इंसान बन सकूं।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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