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मन बुद्धि का राजा है।
मन कहता बुद्धि उस और सधती जाती।
मन जो कहता बुद्धि मान करती जाती।
मन चंचल होता बुद्धि मचला जाती।
मन भटकता बुद्धि अपना समझ लोटा लाती।
मन को इसकी फिर भी न समझ आती।
बुद्धि कुछ बोलती तो मन खौल जाता।
बुद्धि समझाती मन डोल जाता।
बुद्धि मन का अन्तरदविंद सदैव चलता रहता।
कभी मन हावी होता कभी बुद्धि खेल दिखाती।
दोनो फिर बातें कर अधिकार मन को सौंपते।
कुछ बुद्धि ठंडी होती कुछ मन को आराम मिलता।
कुछ मन की बुद्धि सुनता कुछ बुद्धि मन की तामील करती।
जब दोनो की बात मिलती तब दोनो हंसते।
एक दूसरे से संग मिलते और फतह करते चलते।
मन फिर मचलाता और बुद्धि फिर तोलती।
एक अदद मुस्कुराहट कशमकश में बदलती।
अब बुद्धि हावी होने को होती फिर मन भावो का भँवर फेकता।
बुद्धि फसती जाती मन मे डूबने लगती।
जो अभी तक ज्ञान का अधिकारी था फिर एक बार हार जाता।
बुद्धि ही कहती मन तू ही बुद्धि का राजा है।
मन कहता बुद्धि उस और सधती जाती।
येही अनवरत है जारी।
सब होनी इसी की मारी है।
जय हिंद
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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