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मन बुद्धि का राजा है।
मन कहता बुद्धि उस और सधती जाती।
मन जो कहता बुद्धि मान करती जाती।
मन चंचल होता बुद्धि मचला जाती।
मन भटकता बुद्धि अपना समझ लोटा लाती।
मन को इसकी फिर भी न समझ आती।
बुद्धि कुछ बोलती तो मन खौल जाता।
बुद्धि समझाती मन डोल जाता।
बुद्धि मन का अन्तरदविंद सदैव चलता रहता।
कभी मन हावी होता कभी बुद्धि खेल दिखाती।
दोनो फिर बातें कर अधिकार मन को सौंपते।
कुछ बुद्धि ठंडी होती कुछ मन को आराम मिलता।
कुछ मन की बुद्धि सुनता कुछ बुद्धि मन की तामील करती।
जब दोनो की बात मिलती तब दोनो हंसते।
एक दूसरे से संग मिलते और फतह करते चलते।
मन फिर मचलाता और बुद्धि फिर तोलती।
एक अदद मुस्कुराहट कशमकश में बदलती।
अब बुद्धि हावी होने को होती फिर मन भावो का भँवर फेकता।
बुद्धि फसती जाती मन मे डूबने लगती।
जो अभी तक ज्ञान का अधिकारी था फिर एक बार हार जाता।
बुद्धि ही कहती मन तू ही बुद्धि का राजा है।
मन कहता बुद्धि उस और सधती जाती।
येही अनवरत है जारी।
सब होनी इसी की मारी है।
जय हिंद
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏❣❣❣❣❣🇮🇳❣❣❣❣❣✍🌹 भारतीय संविधान भाग 9 अनुच्छेद 243 घ। 243 घ. स्थानों का आरक्षण–(1) प्रत्येक पंचायत में– (क) अनुसूचित जातियों ;और (ख) अनुसूचित जनजातियों, के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात , उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या से यथाशकक़्य वही होगा जो उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की अथवा उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अनुपात उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है और ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आबंटित किए जा सकेंगे। (2) खंड (1) के अधीन आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान, यथास्थिति , अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे । (3) प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए ...
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