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उसके अंदाज़ ही अलग है।
चाहतें बहुत है पर दबा रखी है।
मन उड़ना चाहता है मगर कैद कर रखा है।
दिल मचलाता है पर बांध रखा है।
मन मे ख्याल उमड़ते उनका गला घोंट रखा है।
ऐसे न जाने कोन सी जिंदगी जी रहे है कुछ लोग।
अपने को जैसे तिरस्कार भागी रखा है।
फिर मन करता कोई तो समझे।
फिर दिल करता कोई तो सुने।
फिर रूह चाहती कोई तो पास बैठे।
इन सब मे इच्छायें बेहद दबी हुई सी है।
दिलअपनी कुर्बानियों का हिसाब मांगता फिर रहा है।
रिश्ते सब तुममे त्याग ढूंढते है।
बाकी सब अपनी अपनी सेवा ढूंढते है।
तुम भी किसी का हिसाब दे कंधा ढूंढते हो।
फिर सोचते हो बहुत सोचते हो।
किस किस के लिए करू।
किस किस के लिए जियूँ।
किस किस के लिए सहूँ।
कोई तो मेरा भी हो जिससे ये सब कहूँ।
फिर कहती ही मेरा तोे अंदाज़ अलग है।
सब रिश्ते निभाने मुझ में लिखे है।
सब की जरूरत मैं हूँ।
सब की सेवक भी मैं हूँ।
बस मुझे कौन जाने ये कहाँ लिखा है।
मन मनोस के रह जाती हूँ।
कभी मन मे चीखती चिल्लाती हूँ।
अपने से कह अपने से ही सुन लेती हूँ।
बस दुनिया के लिये लड़ते खुद से हार जाती हूँ।
इसलिये अबला नारी कहलाती हूँ।
फिर सोचती हूँ किस से कहूं।
पर क्यों कहूँ।
क्या रखा है उसे समझाने में।
जिसको मेरी कद्र नही जमाने मे।
क्यों न मैं अपने से ही सवरूँ।
अपने लिये ही सवरूँ।
अपने को देखू और मुस्कुराऊँ।
क्यों न अपनी सहेली खुद बन जाऊं।
सारी खुशियां मन की ताकत से अपने मे समाउँ।
दुनिया कुछ भी कहें मैं क्यों अबला कहलाऊँ।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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