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एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
कितनी बार बुरा सोचा आज मन खोलू।
कितनी बार भूलें की सबसे रूबरू हो लूँ।
ख्यालों की दुनिया से लुटा कुछ सह लूँ
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
अपनो का दिल दुखाया आज सह लूँ।
किसी का विश्वास तोड़ा सजा ले लूँ।
किसी की उम्मीद को तोड़ा दुखी हो लूँ।
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
नाजायज चाहतो को थोपा अपना लूँ।
वादे न निभाये चल आज वादा कर लूँ।
किसी आस से भागा चल आज आस ले लूँ।
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
दम्भ में रहा दम्भ पाया आज मुक्त हो लूँ।
लालचों के वश रहा चल त्याग ले लूँ।
भगवान से डरता रहा चल आराम ले लूँ।
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
अपनी असलियत से दूर रहा सोचा मिल लूँ।
अपनी काबलियत को बोना रखा आज बड़ी कर लूं।
कुछ लंबी भी छोड़ी चल आज समेट लूँ।
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
खुदा की मेहरबानियां बहुत है मुझ पे शायद।
इसलिए भूला था सब अब तक शायद।
जब याद आ ही गयी है अपनी गैरत ले लू शायद।
एक सच चल मैं अपने आप से बोलूं।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏❣❣❣❣❣🇮🇳❣❣❣❣❣✍🌹 भारतीय संविधान भाग 9 अनुच्छेद 243 घ। 243 घ. स्थानों का आरक्षण–(1) प्रत्येक पंचायत में– (क) अनुसूचित जातियों ;और (ख) अनुसूचित जनजातियों, के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात , उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या से यथाशकक़्य वही होगा जो उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की अथवा उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अनुपात उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है और ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आबंटित किए जा सकेंगे। (2) खंड (1) के अधीन आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान, यथास्थिति , अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे । (3) प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए ...
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