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कुछ यूं बीती कुछ यूं गुजरी कुछ कही कुछ सुनी।
जिंदगी बहुत नायाब ही निकली जितनी समझी और सुनी।
हर मोड़ पे इक शख्स उम्र से तजुर्बा लिए खड़ा है।
हम उनसे मुखातिब होते है यहां उम्र जुड़ जाती है।
कुछ आदायें दुनिया की हमपे भी मेहरबां होती है।
हम उनके बहकावे में आते वो हमारी हो जाती है।
वक़्त बे वक़्त दुनिया की हस्तियों से उलझते रहे।
कुछ वो खुद से सुलझ गये बाकी हमे सुलझा गये।
नादान परिंदे भी बहुत मिले नादानियां करते हमे।
हम खुद से नादां हो उन्हें समझदार कहलवा गये।
कुछ तो बेहतरीन मंजरों का भी हमे एहसास हुआ।
कुछ हमने जी लिये बाकी उनके लिए छोड़ आये।
बहुत से गरूर मिले बहुत गरूर टकराये भी हमसे।
कुछ तो हमने गुजरने दिये कुछ की राह बदल दिये।
मोहबतें भी टकराती रही जिंदगी चोट खाती रही।
हम भी मलहम लगाते रहे जिंदगी तुझे संवारते रहे।
वक़्त बहुत जाया हुआ खूबसूरती को समझने में।
खोजी तो भीतर ही छुपी थी जरा धूल में पड़ी थी।
बात बहुत सालों में समझ आयी दुनिया रही पराई।
मोह को लगे हैं सभी प्रेम की किसे कब याद आयी।
कुछ यूं बीती कुछ यूं गुजरी कुछ कही कुछ सुनी।
जिंदगी बहुत नायाब ही निकली जितनी समझी और सुनी।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏❣❣❣❣❣🇮🇳❣❣❣❣❣✍🌹 भारतीय संविधान भाग 9 अनुच्छेद 243 घ। 243 घ. स्थानों का आरक्षण–(1) प्रत्येक पंचायत में– (क) अनुसूचित जातियों ;और (ख) अनुसूचित जनजातियों, के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात , उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या से यथाशकक़्य वही होगा जो उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की अथवा उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अनुपात उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है और ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आबंटित किए जा सकेंगे। (2) खंड (1) के अधीन आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान, यथास्थिति , अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे । (3) प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए ...
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