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वक़्त यू ही गुजरता रहा हम किनारे बैठे रहे।
जिंदगी की लहरें टकराती रही हम निहारते रहे।
कुछ उछल के छू जाती हम महसूस करते रहे।
जब बापिस जाती तो ओझल होती देखते रहे।
कुछ मस्ती करती उछाल मारती खुश होते रहे।
किनारों से मिलके बिखरते अस्तित्व देखते रहे।
किनारों पे आ आवाज करती ये शोर सुनते रहे।
लहरों को दिया वो सब लौटा जाती समझते रहे।
लहरों की हर हलचल को जीवन से जोड़ते रहे।
जीवन मृत्यु के सफर को लहरों से समझते रहे।
कहाँ से उठी कब खत्म ये अनुमान लगाते रहे।
न आरंभ न अंत येही निरंतरता है समझते रहे।
फिर सपनो की नाव बना जीवन लहरों पे सवार हुए।
शुरू में हिचकोले खाते आगे बढ़ते झूंझते रहे।
अथाह जीवन राशि को लांघने को प्रयत्नशील रहे।
क्या जीवन की भोर क्या शब पार जाने को आतुर रहे।
लहरों की नज़र से जीवन देखते और समझते रहे।
वक़्त यू ही गुजरता रहा हम किनारे बैठे रहे।
जिंदगी की लहरें टकराती रही हम निहारते रहे।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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