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कितनी भिन्न भिन्न रचनाओं से पटा संसार है।
हर एक कृति भिन्न है हर एक छटा निराली है।
जिधर देखता हूँ कुछ सुंदर साअच्छा दिखता है।
कभी सोचता हूँ ये माया वश मेरा वहम तो नही?
फिर हर उसकी रची हर कृति को देखता हूँ।
हर कृति एक नायब सा टुकड़ा ही लगता है।
जिसे जितना समझता हूँ ज्ञान वर्धन लेता हूँ।
हर कृति से मिले ज्ञान को भीतर संजो लेता हूँ।
हर कृति में उस ज्ञान को परखता फेल हो जाता हूँ।
क्योंकर हर बार नई कृति में कुछ नया पाता हूँ।
किसी मोड़ पे आकर आंकलन में गलत हो जाता हूँ।
पर एक और ज्ञान साथ अपने संजो ही लाता हूँ।
यू तो भीतर बहुतों से ज्यादा आंखों से पहुंच जाता हूँ।
परिपक्वता का एहसास होने लगता है नादानी कर जाता हूँ।
दिमाग ज्ञानी सुनने को आतुर है मन मे अधूरा पाता हूँ।
हर कृति को हर बार नये रूप में पाता हूँ।
फिर विचार हुआ ऐसे क्यों मैं करता हूँ?
कितनी बार अपने से बेमतलब छला जाता हूँ।
दिमाग पे बोझ बढ़ाता जबरदस्ती अपने को मनाता हूँ।
फिर समझा दुनिया तो नित नई है।
कितना इसे जानोगे?
जितना जाना क्या तुम इससे सब निभा लोगे?
उत्तर एक ही मिला ये भीड़ है।
हर और कुछ अलग है जिसकी तुझे कोई जरूरत नही।
हर और एक दौड़ लगी है जिसकी तुम्हे जरूरत नही।
अपनी मंजिल भीड़ में अकेला कर ढूंढी जा सकती है।
इसलिए तुझे भीड़ का हिस्सा बनने की जरूरत नही।
चल उठ मन शांत कर अपनी तह मंजिल की और बढ़।
न जाने कितने हसीन नज़ारे इंतज़ार में है।
देख इन्हें संजो इन्हें इनका मजा लूट समय कम है।
न काहू से दोस्ती न काहू से बैर ऐसा जीवन कर ले।
बहुत मिलेंगे बहुत छूटेंगे अपनी मंजिल तह कर ले।
रिश्तों में रहकर निभाकर भी अकेला हुआ जा सकता है।
एक कोशिश कर कर तो देख ले।
संसार भी सुंदर उसकी रची हर कृति भी सुंदर।
चल कुछ आनंद कर लें और मंजिलें तह कर ले।
जय हिंद।
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शुभ संध्या।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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