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आज कल त्यौहारों की रौनक देखते ही बनती है।रामलीला का मंचन जगह जगह हिन्दू धर्म की पताका को सुशोभित कर फहरा रहा है। हम भी रामलीला देखने गये।रावण दरबार मे बिभीषण को रावण के द्वारा अपमानित करना और लात मारना समझने का प्रयास किया।बचपन से रामलीला देखते आ रहे है।मंच बेहतर हो गये है मगर मंचन का स्तर काफी कुछ गिरा है।भाषा भी अपना स्तर खो सी रही दिखी।खैर आज से राम रावण के युद्ध का मंचन शुरू हो गया। राम रावण के युद्ध का परिणाम दोनों ही जानते थे। राम रावण का युद्ध जब शुरू हुआ तो रावण को सारा आभास अंत की और ले चला। टक्कर बराबर की थी।तीनो लोको में रावण से टक्कर लेने वाला कोई नही था। अमरत्व रावण की नाभि में था।मगर सब का अंत निश्चित है।जैसे हर युग चक्रकाल के आरंभ और समाप्ति पे ब्रह्मा विष्णु महेश का अंत और उदय होता है।मंदोदरी ने रावण से युद्ध बिभिषिका रोकने का अंतिम प्रयास किया।रावण के द्वारा किये गये अत्याचार और निम्न कृत्य के लिये उसे आगाह किया।उसकी कीर्ति को होने वाले कलंक का आभास दिलाया।पुलत्स्य कुल के समाप्त होनेके संकेत दिये।रावण परम् ज्ञानी था।बिभीषण को अपने से अलग कर पुलत्स्य वंश को बचा गया।कीर्ति योद्धा की युद्ध के समय किये गए शौर्य से मापी जाती है।कीर्ति ऐसी की राम के नाम के साथ अपना नाम भी अमर कर लिया।मंदोदरी को एहसास दिला दिया कि कल उसका अंत निश्चित है और उसे कोई डर नही।मरेगा तो भी ईश्वर के हाथ और उसके बिना राम की भी कीर्ति नही। एक संदेश और दिया कि शांति के लिये राम और रावण में से एक को तो अवश्य मरना होगा।मंदोदरी रावण के ज्ञान को शायद पूरा समझ नही पाई।फिर जब अगली सुबह रावण युद्ध को जाने लगा तो अपशगुन पे वो हंसा और महाकाल के दरबार पहुंचा।अपने अहम घमंड को जानकर उसे दिखाया और इस घमंड का कारण भी महाकाल से कह सुनाया।न उनकी अवज्ञा की न कटु वचन कहे।अपने घमंड से हुई गलती और विवेक हरने को स्वीकारा।मगर झुकना स्वीकार नही किया।न ही आशीर्वाद लिया।इतना जरूर कहा अगर जीवित रहा तो दर्शन करने अवश्य आऊंगा ।उसे मृत्यु का आभास भी था और पूरा ज्ञान भी।जब मृत्यु के अंतिम प्रहार हुआ तो मुह से "है राम" निकला।अंतर्ज्ञान से पूर्ण महापंडित का वध तो हुआ मगर विडम्बना देखिए रावण का नाम उसके कहे अनुसार अमर हो गया। पूरी रामायण का आधार ही राम रावण युद्ध की पृष्ठ भूमि है।पूर्ण काल मे रावण ने सीता को कभी नही छुआ उसे सीता के अग्नि कवच का आभास संज्ञान सीता को देखते ही हो गया था।वंश भी बच गया।मंदोदरी बिभीषण से विवाह कर गयी सीता स्तीत्व में रह धरा में समा गई।रावण को जानने का मन हुआ तो लिखा। रामायण का एक पहलू यह भी है। हमारे चारों और कितना कुछ बहुत कुछ हमारे अपनो के द्वारा ही घटित है। उनकी निष्ठा हमारे उदय अंत के लिए बहुत कुछ बता देती है।ग्रन्थ जिनकी कुंजी है।हर पहलू को जानना चाहिये।ये भी एक है।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
अति सुंदर विश्लेषण
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