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धन ।

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धन हर इंसान के जीवन में बहुत महत्व रखता है।सांसारिक सुख सब धन के अधीन किसी न किसी रूप में है ही। धन जी भर कामना और सुख पूर्वक भोगना विरले ही कर पाते है।धन अत्यंत आवश्यक है तो ये बहुत से दोषों का भागी भी है। जरूरत से ज्यादा हो जाये तो सर चढ़ कर बोलता है। ना हो तो दरिद्रता रूप में बुद्धि भी दरिद्र कर देता है। सीमित हो तो लालच की शुरुआत करा देता है। और जैसे जैसे बढ़ता है लालच दिमाग पे भी कब्जा कर लेता है। दूसरों की नज़र में शीघ्र आता है। धन सब रिश्तों को तहस नहस करने में निपुण है। किसी को दिया और फिर बापिस मांगा तो समझो गुनाह हो गया। अपने सब क्षण भर में पराये हो जाते है। तो धन को सहेजना भी कला है। धन कर्म से ही कमाया उत्तम है। उधारी आप की सबसे बड़ी शत्रु है। मांगने वालों की भी रिश्तों में पूछ नही होती। दिखावे की तो पीठ पीछे बुराई तह है।धन बड़ी कातिल चीज़ है जरा सा ध्यान हटा समझो दुर्घटना घटी। इस संसार मे ज्यादतर झगड़े किसी न किसी रूप में धन को लेकर ही है। तार तार होते रिशतों में मुख्य घटक भी ये ही है। धन होना चाहिए इससे इनकार नही। ये आप को ऐश्वर्य का स्वामी बनाता है।जरूरते पूरी करता है। आत्म विश्वास भी मजबूत करता है। समाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ाता है।धन के दोनों पहलू को ध्यान में रखकर हमारे वेद भी कुछ कहते है। इसे ध्यान से पढ़े।

"धनवान व्यक्ति के धन की सार्थकता उसकी दानशीलता में होती है कृपणता में नहीं"

ऋग्वेद के दशवें मंडल के 117वें सूक्त में कहता है-
पृणीयादिन्नाधमानाय तन्यान् द्राधीयासमनु पश्येत पन्थाम्
ओ हि वर्तन्ते चक्राऽन्यमन्यमुप तिष्ठन्त राय:।।
याचक को अन्न दान करने वाला धनी है। सुख और संपदा रथ के पहिए की तरह ऊपर नीचे आते-जाते रहते हैं, धन किसी के पास सदैव नहीं रहता है। यह एक के बाद दूसरे को और दूसरे के बाद तीसरे को प्राप्त होता रहता है।
तो धन दान स्वरूप ही  आपको महान बनाता है अलबत्ता तो ऊपर लिखा आप उसके लिए तैयार रहें।
दान भी अनेक है। इन्हें भी जानिए।
दान चार प्रकार का होता है:  (1) नित्य (2) नैमित्तिक (3) काम्य और (4) विमल। 
जिस व्यक्ति का अपने ऊपर किसी भी प्रकार उपकार न हो उस व्यक्ति को नित्य कुछ दान देने को नित्यदान कहते हैं।ये उत्तम है। पाप कर्म की शांति के लिए दिया जाने वाला दान नैमित्तिक दान कहा जाता है। सुख प्राप्त करने के लिए, संतान के लिए, ऐश्वर्य भोग के लिए दान देना काम्य दान कहा जाता है। सुंदर चित्त से ईश्वर की प्रसन्नता हेतु अपनी विमल बुद्धि का सहारा लेकर दान देना विमल दान है। कोई कामना इस दान में नहीं रहती। विमल दान का कोई सानी नही।
प्रभु जो देता है, उसका ज्यादा हिस्सा हम स्वयं उपयोग करते हैं। उसमें से थोड़ा दशांश दान करना पुण्य ही पुण्य है। जो कुछ भी दान दिया जाए वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिए। श्रद्धाविहीन दान का कोई अर्थ नहीं है। दान में सदैव लज्जा का भाव होना चाहिए कि ‘मैं तो थोड़ा ही दे रहा हूं। सारा धन तो प्रभु का ही है जो कुछ दे रहा हूं वह थोड़ा ही है।’
अगर क्षमता है तो गरीब को किया भूदान सभी दानों में महान दान है-
नास्त्ति भूमि समं दानं, नास्ति भूमि समोनिधि:।
नास्त्ति सत्य समो धर्मो, नानृतापातकं परम्।।
सभी प्रकार के दानों में यह भूमिदान श्रेष्ठ पवित्र पुण्यदायक है। वेद का वचन है कि दान देने के लिए धन कमाओ, संग्रह और विलासिता हेतु नहीं।
मित्रो खूब धन कमाओ। जरूरत अनुसार भोगो।फिर उसके उत्तम दान स्वरूप परलोक सहित अगले जीवन की आधारशिला बेहतर रखो। इस संसार को भी जमकर भोगो और अपने साथ जुड़े बंधु बांधवों में दिखावे की जगह इससे किये दान का महत्व बढ़ाओ। रिश्ते भी कमाओ और खुद भी खुश आस पास भी खुश नुमा माहौल बनाओ।
धन और दान की सही समझ ही आप के सुख का रास्ता है।
जय हिंद।
****🙏****✍️
शुभ रात्रि।

"निर्गुणी"
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