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धर्म और पंथ?

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कुछ असहज से प्रश्न मन में कभी कभी समाज में पनपती विकृति को देख आ जाते है। हम हिंदी भाषी लोग है। मुझे न इंग्लिश का गूड ज्ञान है और न ही हिंदी में मजबूत पकड़ और उर्दू अरबी फारसी फ्रेंच तो भूल ही जाइए। फिर में आजकल टेलीविजन पर बहुत ज्ञानवान लोगो को धर्म और पंथ का अनुवाद और मतलब समझाते देखता हूं। 
धर्म वो है जो धारण योग्य हो बस इतनी सी बात समझ आती है। इसकी कुछ मूल शिक्षाएं है जो बहुत ही वैचारिक सामाजिक चेतना है।
फिर लोग पंथ समझाने लगते है। बस हम यहीं ज्ञानियों को समझ नही पाते। धर्म विश्व में बस एक है बाकी सब पंथ। 
इसी से प्रश्न उठता है क्या ईसाई धर्म की परिभाषा में नही आ सकते? क्या मुस्लिम धर्म की परिभाषा में नही सकते? ऐसे ही बौद्ध जैन बहाई यहूदी आदि आदि भी?
इन सब जगह धर्म के ये दस लक्षण क्या नही पाए जाते...
धैर्य, क्षमा (सहिष्णुता), मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, मन-वचन एवं कर्म की शुद्धता, इन्द्रीयनिग्रह, शास्त्रों का ज्ञान, आत्मज्ञान, सत्यभाषण एवं अक्रोध।
मुझे लगता है ये सब बातें सब जगह मोजूद है। उपवास ,रोजे , फास्टिंग के माध्यम से इन विश्व के तीन बड़े धर्मो में "नियंत्रण , मन वचन कर्म की शुद्धता, अक्रोध ", धर्म के लक्षणों के मोजूद होने के प्रमाण है।  
श्रावण मास माघ मास में हमारे यहां व्रत होते है। रमजान में मुस्लिम समुदाय रोजे करता है। गुड फ्राइडे से 40 दिन पहले से ईसाई समुदाय फास्ट करता है।
सभी धर्म या पंथ (ज्ञानियों के हिसाब से) प्रेम का संदेश तो दे ही रहे है।
अब हम धर्मनिरपेक्ष हुए या पंथनिरपेक्ष हुए तो क्या फर्क पड़ा?
Religion के मायने क्या है? ये भाषाविदों का अनुसंधान है।
मैं आम आदमी हूं🤔
सही मायनो में मुझे ये सब समझने के बाद कुछ फर्क नहीं  पड़ा और पड़ने वालो को शायद पढ़ते पढ़ते पड़ा। 
मेरे अल्पज्ञान के लिए क्षमा और न समझा पाया हूं तो और भी क्षमा।
धन्यवाद।
जी हिंद।
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शुभ रात्रि।
"निर्गुणी"
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