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लासल गांव में मंडी सजी हुई है।

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ओ महाराज सुनो!
कहो मोटू....
सुना है साहेब लासल गांव में  मंडी सजी हुई है।
बिचौलियों की बांछे खूब खिली हुई है।
चुनावी खर्च की जो भरपाई हो चली है।
एक गरीब किसान कुदरत से लड़ता आता है बेचारा।
खूब धूप में पांच सौ छब्बीस किलो प्याज लदवाता है बेचारा।
बड़ी उम्मीद से दोपहर की रोटी ले घर से चलता है बेचारा।
सोचा कल की रोटी का भी इंतजाम कर लाऊं?
इसी उम्मीद में..
किसी तरह घर से चालीस मील मंडी पसीने में लथ पथ पहुंचता है बेचारा।
अपनी मेहनत से उगाई लाल प्याज को तुलवाता है बेचारा।
अरे पांच सौ छब्बीस किलो है तुका राम चवन साहिब।
पर्ची ले किसान खुशी से आड़ती से मिलता है बेचारा।
लो तुका राम ये चेक और पंद्रह दिन बाद लगा लेना।
दो रुपिया बने है इसे जल्दी से भूना लेना।
तुका राम की गहरी आंखों संग निराशा माथे पे आई थी।
जो पांच सौ छब्बीस किलो प्याज वो लाया था उसकी पांच सौ रुपए ढुलाई थी।
चौबीस रुपए की पर्ची मंडी में कटवाई थी
बाजार का आज भाव भी एक रुपए किलो का था ये उसको कहां पता था।
बाजार की पर्ची काट कर हाथ में दो रुपिया की बड़ी रकम आई थी।
तुका राम की नस काटो तो मानो खून नही।
जो फसल पैदा करने में पांच हजार की लागत आई थी।
उसकी बाजार ने एक रुपया कीमत लगाई थी।
मन आया के फांसी लगा लूं।
या इस किसानी को ही आग लगा दूं।
मेरे वतन में सुना है अमृत काल है ।
जय जवान जय किसान के नारे का अब ये हाल है।
दुगनी आय के उम्मीद में कहीं अपनी कीमती वोट गवाई थी ।
अब तो घरवाली भी बाट जो रही होगी!
कुछ खयालों में खोई होगी।
सोच रही होगी पतिदेव कमा के लायेंगे।
एक साड़ी का वादा किया था।
शायद निभायेंगे।
उसे क्या पता था?
जेब में जो सौ का नोट ले के वो चला था।
बस का किराया दे के जो बचा था मंडी में सब लुटा था।
पछत्तर साल हुए हमे आज़ाद हुए तब ये अमृत काल आया था।
तुका राम शायद अभी  आजादी के मोड़ पे आया है।
सोच रहा है आजाद ही हो न जाऊं मैं?
जो इज्जत नीलम हुई है उसे घर कहां ले जाऊं मैं?
चलो यहीं फांसी लगाता हूं?
अपने प्रधान सेवक को जगाता हूं। 
साहेब देर तो बहुत हो चुकी अब।
ऐसा न हो मेरी सांस की डोर ही टूट जाए।
जब तक प्रधान सेवक को होश आए मेरी दुनिया ही उजड़  जाए।
सुनो!
तेरे स्वाद के लिए अब कोई मेरे खेत में जगह नहीं है।
शायद यही श्राप है मेरा।
आज न कल जो हो जाए तेरा।
इस दुखी आत्म से स्वर खाली न जाए मेरा ।
सुना है साहेब लासल गांव में आज मंडी सजी है।
बिचौलियों की बांछे खूब खिली हुई है।
धन्यवाद।
जय हिंद।
****🙏****✍️
शुभ रात्रि।
"निर्गुणी"
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