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अमूमन मैं शाम को अगर अपने दफ्तर गया तो 4 या 4.30 बजे शाम को घर के लिए निकलता हूं। आज भी जब निकला। मौसम बेहद गर्म था। लू चल रही हो तो 40 डिग्री भी बहुत थपेड़े मारता है। मैदानी इलाकों में जमीन पानी सब गर्म हो जाता है। ये गर्मी खेती बाड़ी में बहुत उपयोगिता भी रखती है। मगर जब जमीन गर्म होती है तो नंगे पैर अपने पे आसानी से धरने नही देती। आज पिता जी की याद भी आ गई। हमारे पिता का जन्म भी पंजाब के एक गरीब परिवार में हुआ था। पढ़ने के लिए स्कूल भी घर से सात किलोमीटर दूर था। बताते थे चप्पल के पैसे तो नही होते थे और गर्म जमीन पे खेतों खेतों चल के भी जाना पड़ता था। और वे पीपल के पत्ते पैरों में बांध कर जाया करते थे। समय बदला आज मुझे याद नही पड़ता की में कभी अपने जीवन काल में कभी बिना चप्पल के रहा। घर के बेड़े में कभी धूप में अगर पैर रख भी दिया तो जल्दी से भाग के बापिस ठंडे में आ गए। आप सोच रहे होंगे ये सब क्या बात लिख रहा है। बात ये है कुछ लोगो की दुनिया अभी भी वही साठ साल पीछे है। वो भी दिल्ली जैसे शहर में। स्कूल तो भूल ही जाईए।ये नजारा बहुत से शहरों का है और मानिए गुजरात का भी है। मैं अपने दफ्तर से निकल गाड़ी में बैठा और घर की तरफ दौड़ा दी। रास्ते में हल्दीराम का रेस्तरां है। उसके सामने कुछ औरते हमेशा भिक्षा के लिए खड़ी रहती है सुबह 10 बजे से ही। ये रोज का काम है उनका। आज इत्तेफाकन कुछ छोटे छोटे बच्चे बमुश्किल 6 से 8 वर्ष के तीखी धूप और तपती सड़क पे मिट्टी से सने नंगे पांव इधर उधर भाग रहे थे। न गर्म सड़क की जलन न तीखी धूप का ताप उन्हे खा रहा था। मगर मैं बस इस दशा को देख आज न जाने क्यों मायूस सा हो गया।
क्या जो हमारे संसार में आया है उसे एक आम जीवन का भी अधिकार नही?
समाज तरक्की तो करता है मगर बहुतों को शहरों में बने पुलों के नीचे छोड़ जाता है।
प्रश्न तो मेरा भी है कि अपने से मैने क्या किया?
ये सब लंबे समय से देख रहा हूं। मगर जब वहां एक बच्ची को नंगे पांव तप्ती सड़क पे कुछ पैसे की आस में देखा तो आंखें दिल मन सब भर आया।
सोचता हू क्या करूं?
आज विचार तो आ ही गया। आगे देखता हूं क्या मैं अपने देश के कुछ बच्चों को इससे बाहर ला पाऊंगा? देखता हूं!
धन्यवाद
शुभरात्रि।
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जय हिंद।
"निर्गुणी"
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