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किंचित आज मन में बार बार अहंकार शब्द गूंज रहा है। समाज में चारों और ये बेहद विकराल रूप ले चुका है। "मैं" की हद अब बेहद रूप में सब और दिखाई देने लगी है। अहंकार के सबसे बड़ी गति ये है के ये दिमाग और आम समझ को आंशिक समय के लिए शिथिल कर देता है। और इसी दौरान मनुष्य रूपी जानवर बेकाबू हर रूप में हो जाता है।
बचपन से ही घर में हमें इससे दूरी बनाए रखनेकी सलाह दी जाती रही है। बार बार चेताया भी जाता रहा है। "फलों से लगा वृक्ष झुका रहता है"। अहंकार के दुष्परिणाम हमे बहुत तरह के उदाहरण देकर समझाए जाते रहे है। स्कूल में भी इसकी खूब शिक्षा समय समय पर दी जाती थी।
मगर मनुष्य रूपी जानवर हर वक्त मनुष्य रूप में तो नहीं रह सकता।
राक्षस कुल में भी इसे तूल नही दिया जाता था। राक्षस स्वभाव से ही अहंकारी और क्रोधी होते है।
इसलिए एक बात जान लीजिए बुरी सलाह से राजा खत्म हो जाता है, अहंकार से गुण और नशा करने से शर्म नष्ट हो जाती है ।
ऐसा ही एक संवाद रामायण में देखने को मिलता है ---
शूर्पणखा और रावण का प्रसंग - श्रीरामचरितमानस के अरण्य कांड में लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक, कान काट दिए थे। इसके बाद वह रावण के पास जाती है और राम-लक्ष्मण से बदला लेने के लिए कहती है। इस दौरान शूर्पणखा रावण से कहती है कि किन अवगुणों से संन्यासी, पराक्रमी राजा और गुणवान व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं।
शूर्पणखा कहती है कि- संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी।।
इस चौपाई का अर्थ यह है कि विषयों के संग यानी वासना और लोभ की वजह से संन्यासी, मंत्रियों की बुरी सलाह से पराक्रमी राजा संकट में फंस सकता है, नष्ट हो सकता है, मान से ज्ञान, मदिरापान यानी नशे से शर्म खत्म हो जाती है, नम्रता के बिना प्रेम और अहंकार से गुणवान व्यक्ति भी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार की नीति मैंने सुनी है।
रावण का अंत हम सबने सुना ही है। अहंकार वश क्रोध में आ अपनी बहन के श्राप से ग्रसित रावण का अंत हुआ।
हमारे तीन पवित्र ग्रंथों में अहंकार को समझाया गया है।
आज रामायण से कुछ अंश लिए। अगले लेख में महाभारत और गीता से होंगे।
अहंकार और क्रोध का मिलन विनाश है।
जो व्यवहार आज एक सांसद के साथ हुआ नही होना चाहिए था।
अहंकार बुरा ही नहीं घातक भी है।
"मीठी वाणी बोलिए , झुका के मस्तक दिल खोलिए।
बुरा न किसी को कहिए , मन से वाणी में रस घोलिए।
जो अभिमान मन को आए तो कचरे के डब्बे में डालिए।
प्रेम की पोथी ले प्रेम बांटिए , जे समझो तो जीवन तरलिए।
वरना मनुष्य तो जानवर है जब चाहे थप्पड़ जड़लिए।"
अब भगवद गीता का श्लोक
"दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ।। (गीता १६।४)"
इसकी व्याख्या अगले लेख में। आज के लिए बस इतना ही।
धन्यवाद।
शुभ रात्रि।
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जय हिंद।
"निर्गुणी"
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