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कल से आज तक व्यर्थ के अहंकार और अभिमान वश उपजे क्रोध के कई उदाहरण सामने आ रहे है।
शिक्षक अपने विवेक से दूर होता दिखाई दिया। भाई अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता दिखा। मित्र हर तरह से सही साबित होता दिखाई दिया।
हमारा समाज पिछले पचास वर्षों में कुछ ज्यादा ही असहनशील नजर आने लगा है।
"एक कहो और आगे से दस सुनो"
स्तिथि कमोवेश सब जगह दिखाई देने लगी है।
कल बात के अंत में गीता में कुछ व्याख्या आपके समक्ष रखनी थी।
श्लोक ये था ----
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ।। (गीता १६।४)
गीता (१६।४) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—हे पार्थ ! दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं ।
भगवान श्रीकृष्ण ने इन दुर्गुणों को ‘आसुरी सम्पदा’ कहा है । ‘आसुरी सम्पदा’ का अर्थ है तमोगुण से युक्त अहंकार, दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता आदि दुर्गुणों और बुराइयों का समुदाय जो मनुष्य के अंदर विद्यमान रहते हैं ।
ये ही दुर्गुण मनुष्य को संसार में फंसाने वाले और अधोगति में ले जाने वाले हैं ।
अहंकार व्यक्ति के अज्ञान और मूर्खता का परिचायक
मनुष्य में अपने धन, बल, यौवन, जाति, कुल, सौन्दर्य, कला, विद्वता, सद्गुणों और सत्ता का नशा होता है। इसे ही अहंकार, दर्प, दम्भ, अभिमान, घमण्ड या गर्व कहते हैं । दूसरों की तुलना में खुद को ऊंचा, श्रेष्ठ व पूज्य समझना। मान-बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजा करवाने की भावना रखना और इन सबके प्राप्त होने पर प्रसन्न होना और दूसरों को तुच्छ समझकर उनकी अवहेलना करना—ये सब अहंकार के ही लक्षण हैं ।
अहंकारी व्यक्ति सदैव अपनी ही प्रशंसा करता है । दूसरे लोग चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, उसे अपने से बौने ही लगा करते हैं ।
इस तरह अहंकार व्यक्ति के अज्ञान और मूर्खता का परिचायक है ।
गीता (३।२७) में भगवान ने इन्हीं आसुरी सम्पदा से युक्त लोगों को
‘अहंकारविमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ कहा है ।
अर्थात्—ऐसा अहंकारी मनुष्य अज्ञानवश ‘मैं यह हूँ’, ‘मैं वो हूँ’, ‘यह तू है’, ‘यह तेरा है’, ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानकर हरेक कार्य को अपने द्वारा किया हुआ समझता है।
इसलिए कर्म के बंधन में बंध जाता है और कर्मों का फल भोगने के लिए बार-बार संसारचक्र में घूमता रहता है । यही उसके दु:ख व पतन का कारण है ।
मनुष्य की अच्छाइयों व लक्ष्मी के नाश का कारण है अहंकार।
गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति—इन तीनों योगों में अहंकार को त्यागने पर विशेष जोर दिया गया है—
कर्मयोग (२।७१) में निर्मम-निरहंकार होने से मनुष्य को परम शान्ति की प्राप्ति हो जाती है ।
ज्ञानयोग (१८।५३) में निर्मम-निरहंकार होने से मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति हो जातीहै ।
भक्तियोग (१२।१३-१४) में निर्मम-निरहंकार होने से मनुष्य को परम प्रेम की प्राप्ति हो जाती है ।
निर्मम-निरहंकार का अर्थ है जो अपने-पराये, मैं-मेरापन की भेदबुद्धि से ऊपर उठकर सबके साथ अपने जैसा व्यवहार करता है ।
मनुष्य को अभिमान भगवान से अलग कर देता है
भक्ति में अहंकार भक्ति को तामसी कर देता है। जो लोग यह हठ करते हैं कि हम ही सही हैं, ईश्वर उनको छोड़ देता है क्योंकि भगवान को गर्व-अहंकार बिल्कुल भी नहीं सुहाता है।
इसलिए कहा गया है --
तब तक ही हरिवास है, जब तक दूर गरूर ।
आवत पास गरुर के, प्रभु हो जावें दूर ।।
भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभामा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो ।
भगवान अकिंचन (दीन) को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं।
इन सब बातों को आज के परिपेक्ष में भलीभांति समझा जा सकता है।
बस जरूरत है तो व्यर्थ के अहंकार अभिमान दंभ का त्याग।
मनुष्य रूप में श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए इतना ही काफी है।
महाभारत में दिए ज्ञान को अगली पोस्ट में सांझा करूंगा।
धन्यवाद।
शुभ रात्रि।
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जय हिंद।
"निर्गुणी"
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