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कभी सोचते है के हम क्या कर रहे है।
लगता गुजरता वक़्त ही पास कर रहे है।
जिंदगी उलझा ली बिना मंज़िलों के हमने।
किस राह दौड़ रहे है कोई खबर नही हमे।
किधर उड़ाये ले जा रही हमे ये इसे ही पता।
हम कल भी बेखबर थे आज भी बेखबर है।
सुबह होते ही रोजमर्रा की राह हो लेते है।
अपने समय से कुछ कीमत निकाल लाते है।
बहुत बार राहों में कुछ मंज़िलों की धुंधली सी आवाज़ आती है।
हम नासमझ उसे हवा की गूंज समझ कही और निकल जाते है।
बहुत बार ये सपनो में आ जोश भर जाती है।
आंख खुलते ही पता नही कहाँ नदारद हो जाती है।
कुछ छोटी सफलता मिलती तो मंज़िल मान लेते है।
थोड़ी दूर निकलते वो एक पड़ाव हो रहती बस।
फिर जिंदगी की उलझनों से सामना होता है बेवक़्त।
फिर न कोई मंज़िल समझ आती है ना कोई राह ही पहचान होती है।
ये बहुत विचारने को मन कई बार करता है।
मगर वो जगह नही मिलती जहां कुछ देर ठहर सकें।
कभी सोचते है के हम क्या कर रहे है।
लगता है गुजरता वक़्त बस हम पास कर रहे है।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।
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🌹🙏💫💫💫💫💫💫💫🇮🇳💫💫💫💫💫💫💫🌹✍️ बीते तीन चार दिनों मैं पारिवारिक यात्रा पे रहा। ससुराल के सुख का आनंद लिया। और कुछ अपने संबंधियों से मुलाकात भी की। मैं अपने जन्मस्थान पे हमेशा जाता हूं और वहां भी गया। वहां मेरी रूह बसती है। हां वहां भी गया जहां जाकर मुझे आत्मिक शांति और अध्यात्म का अनुभव होता है। मां मुझे अपने दर पे आने देती है। मेरे मन की सभी तृष्णाएं और सब अहंकार वहां हवन कुंड में स्वाह हो जाते है। मैं "मां श्री नयना देवी जी" की बात कर रहा हूं। और ये सत्य है । आप की जहां श्रद्धा आस्था होती है ये सब अपने आप दूर हो जाते है। और एक बात , ईश्वर सब को समय समय पे आइना किसी न किसी रूप में दिखाते रहते है। आस्थावान को इशारा मिलता है और सुधार होता है। बाकी की आंख पे पट्टी बंध जाती है। आज महाभारत में दिए ज्ञान को समझने की जरूरत है। जान लीजिए भगवान स्वयं अपने भक्तों का अभिमान दूर करते हैं , फिर वह चाहे उनकी अर्धागिनी सत्यभाभा हों, प्रिय गोपियां हों, अभिन्न मित्र अर्जुन हो, वाहन गरुड़ हो या भक्त नारद हो । भगवान अकिंचन को ही प्राप्त होते हैं अभिमानी को नहीं। अर...
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