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सफलता- भगवद्गीता की नज़र से।

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सफलता जीवनचक्र मे बहुत खास  और जरूरी है। आप के सुदृढ़ सफल व्यक्तिव का आधार है। आपके के चलते रहने और आगे बढ़ने का प्रमाण है। बचपन से छोटी छोटी सफलताएं हमे घसीटने( कसुतड़ने) से लेकर चलना सीखाती है। जब चलना सीख जाते है तो दौड़ने लगते है। फिर पीछे मुड़ कर नही देखते। मगर उम्र और जीवन संघर्ष इस नीति को बदल देते है। फिर से हमें इसे जीवन के किसी मोड़ पर आकर समझने की आवश्यकता पड़ती है। बहुत सी प्रबंधन की किताबों में इसके जिक्र लक्षण आधार समझने समझाने को मिल जाएंगे। क्यों न इसे गीता के माध्यम से समझा जाये।अर्जुन की सफलता कोई छोटी सफलता नही थी। जो असम्भव लग रहा था वो विजय रूपी संभवता से प्रेरणादायी इतिहास बन गया।
भगवान कृष्ण ने गीता के माध्यम से संसार को जो शिक्षा दी, वह अनुपम है। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार है ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र का सार है गीता। सार का अर्थ है निचोड़ या रस।गीता में उन सभी मार्गों की चर्चा की गई है जिन पर चलकर मोक्ष, बुद्धत्व, कैवल्य या समाधि प्राप्त की जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जन्म-मरण से छुटकारा पाया जा सकता है। तीसरे शब्दों में कहें तो खुद के स्वरूप को पहचाना जा सकता है। चौथे शब्दों में कहें तो आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और पांचवें शब्दों में कहें तो ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
और अगर जीवन में सफलता चाहते हैं ‍तो गीता के ज्ञान को अपनाएं और निश्‍चिंत तथा भयमुक्त जीवन पाएं।
सफलता : भगवान श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहते हैं, तो अपनी रणनीति बदलें, लक्ष्य नहीं। ...इस जीवन में न कुछ खोता है, न व्यर्थ होता है। ...जो इस लोक में अपने काम की सफलता की कामना रखते हैं, वे देवताओं की प्रार्थना करें।
प्रसन्नता : श्रीकृष्ण कहते हैं कि खुशी मन की एक अवस्था है, जो बाहरी दुनिया से नहीं मिल सकती है। खुश रहने की एक ही कुंजी है इच्छाओं में कमी।
आत्मविनाश या नर्क के ये 3 द्वार हैं- वासना, क्रोध और लोभ। क्रोध से भ्रम पैदा होता है। भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है। जब बुद्धि व्यग्र होती है, तब तर्क नष्ट हो जाता है। जब तर्क नष्ट होता है, तब व्यक्ति का पतन हो जाता है। ...वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है और 'मैं' और 'मेरा' की लालसा और भावना से मुक्त हो जाता है, उसे शांति प्राप्त होती है।
विश्वास क्या है? : मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है। जैसा वो विश्वास करता है, वैसा वो बन जाता है। ...व्यक्ति जो चाहे बन सकता है यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करे। ...हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति के अनुसार होता है। विश्‍वास की शक्ति को पहचानें।
मित्र और शत्रु दोनों है मन : जो मन को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है। मन की गतिविधियों, होश, श्वास और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है और लगातार तुम्हें बस एक साधन की तरह प्रयोग कर के सभी कार्य कर रही है।
 मन अशांत है और उसे नियंत्रित करना कठिन है, लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है। ...सर्वोच्च शांति पाने के लिए हमें हमारे कर्मों के सभी परिणाम और लगाव को छोड़ देना चाहिए। ...केवल मन ही किसी का मित्र और शत्रु होता है।
निर्भीक बनो : उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है, न कभी था न कभी होगा। जो वास्तविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। ...प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए, गंदगी का ढेर, पत्थर और सोना सभी समान हैं।
संशय न करो : सदैव संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता न इस लोक में है, न ही कहीं और। आत्मज्ञान की तलवार से काटकर अपने हृदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो। अनुशासित रहो। उठो।
संदेह, संशय, दुविधा या द्वंद्व में जीने वाले लोग न तो इस लोक में सुख पाते हैं और न ही परलोक में। उनका जीवन निर्णयहीन, दिशाहीन और भटकाव से भरा रहता है।
आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है : जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है जितन‍ी कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर शोक मत करो।
न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...। सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएंगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो?
यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मती है और न मरती है अथवा न यह आत्मा हो करके फिर होने वाली है, क्योंकि यह अजन्मी, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी यह नष्ट नहीं होती है।
कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं, तुम या ये राजा-महाराजा अस्तित्व में नहीं थे, न ही भविष्य में कभी ऐसा होगा कि हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाए। ...हे अर्जुन! हम दोनों ने कई जन्म लिए हैं। मुझे याद हैं, लेकिन तुम्हें नहीं।
कर्मवान बनो : निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है। ...अपने अनिवार्य कार्य करो, क्योंकि वास्तव में कार्य करना निष्क्रियता से बेहतर है।
 ज्ञानी व्यक्ति को कर्म के प्रतिफल की अपेक्षा कर रहे अज्ञानी व्यक्ति के दिमाग को अस्थिर नहीं करना चाहिए। ...अप्राकृतिक कर्म बहुत तनाव पैदा करता है। ...किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि अपना काम करें, भले ही उसे अपूर्णता से करना पड़े। ...बुद्धिमान व्यक्ति कामुक सुख में आनंद नहीं लेता। ...कर्मयोग वास्तव में एक परम रहस्य है।
जो मेरे साथ हैं मैं उनके साथ हूं : संपूर्ण ब्रह्मांड मेरे ही अंदर है। मेरी इच्छा से ही यह फिर से प्रकट होता है और अंत में मेरी इच्छा से ही इसका अंत हो जाता है। ...मेरे लिए न कोई घृणित है न प्रिय, किंतु जो व्यक्ति भक्ति के साथ मेरी पूजा करते हैं, वो मेरे साथ हैं और मैं भी उनके साथ हूं। ...बुरे कर्म करने वाले, सबसे नीच व्यक्ति जो राक्षसी प्रवृत्तियों से जुड़े हुए हैं और जिनकी बुद्धि माया ने हर ली है वो मेरी पूजा या मुझे पाने का प्रयास नहीं करते।
हे अर्जुन! कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूं।
 मैं उन्हें ज्ञान देता हूं, जो सदा मुझसे जुड़े रहते हैं और जो मुझसे प्रेम करते हैं।
 मैं सभी प्राणियों को समान रूप से देखता हूं, न कोई मुझे कम प्रिय है न अधिक। लेकिन जो मेरी प्रेमपूर्वक आराधना करते हैं वो मेरे भीतर रहते हैं और मैं उनके जीवन में आता हूं। 
 मेरी कृपा से कोई सभी कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी बस मेरी शरण में आकर अनंत अविनाशी निवास को प्राप्त करता है। ...हे अर्जुन! केवल भाग्यशाली योद्धा ही ऐसा युद्ध लड़ने का अवसर पाते हैं, जो स्वर्ग के द्वार के समान है।
ईश्‍वर के बारे में : भगवान प्रत्येक वस्तु में है और सबके ऊपर भी। ...प्रबुद्ध व्यक्ति सिवाय ईश्वर के किसी और पर निर्भर नहीं करता। ...सभी काम छोड़कर बस भगवान में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा। शोक मत करो। 
 जो कोई भी जिस किसी भी देवता की पूजा विश्वास के साथ करने की इच्छा रखता है, मैं उसका विश्वास उसी देवता में दृढ़ कर देता हूं। ...हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूं, किंतु वास्तविकता में कोई मुझे नहीं जानता।
 ईश्वर एक अदृश्य एवं अकथनीय शक्ति है जिससे संसार की उत्पत्ति, पालन एवं लय होता है। मानवीय रूप में उसकी ऐसी कल्पना की जा सकती है कि उसके सभी ओर से ज्ञानेन्द्रियां और कर्मेन्द्रियां हैं। 
 'सर्वत: पणिपादं तर्त्सतोsक्षिशिरोमुखम।' 
वह समय-समय पर संसार में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए सगुण रूप में अवतरित होता है। 
 वह जो मृत्यु के समय मुझे स्मरण करते हुए अपना शरीर त्यागता है, वह मेरे धाम को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। ...वे जो इस ज्ञान में विश्वास नहीं रखते, मुझे प्राप्त किए बिना जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुगमन करते रहते हैं।
सफलता के कई मायने हो सकते है। ।मगर गीता में इन उपदेशो के जरिये शिक्षा दी गयी है के प्रथम हमारा लक्ष्य , फिर खुद में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, प्रसन्नचित, सधा मन, सभी संशयो से दूर बुद्धि , निर्भीक मन , कर्मवीरता ,ईश्वर और स्वयं में विश्वास ही सफलता है। असफलता लक्ष्य नही बदल सकती परंतु आप रणनीति अवश्य बदल सकते है। येही संक्षिप्त में सफलता की राह है।
जय हिंद।
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शुभ रात्रि।

"निर्गुणी"
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